वनस्पति

वक्त के पीछे की तस्वीरें खूब परेशान करती है ,
जो कुछ भी हुआ था अतीत में ,
उसका दुःख आज भी वर्तमान करती है ,
दरवाजा ठीक से लगाया तो था  उन सभी बुरी घटनाओं पर ,
कायम नहीं हो सकी कच्ची नाराजगी मेरी ,
लेकिन अतीत से आती वो आवाज आज भी मेरा अपमान करती है 
वो कच्चे दिन थे ,
नयी नयी दिलकशी थी ,
जब नया नया नाम था ,
नए नए चेहरे थे ,
जब सब कुछ अनजान था ,
बातें भी शुरुवाती एक दूसरे के जान पहचान के लिए होती थी ,
कुछ मैं अपनी रुचि से बोलता था ,कुछ उनको भी जिज्ञासा होती थी 
सवाल जवाब की वो  पारियां कभी दोनों को  हसाया करती थी ,
मेरे सपनो की रोचक तत्य जानकार वो मुस्कुराया करती थी ,
जो कभी मेरे सभी दर्द की वनस्पति थी ,
वो अब जीवन में खालिस्तान की तरह रहती है 
दरवाजा ठीक से लगाया तो था  उन सभी बुरी घटनाओं पर , कायम नहीं हो सकी कच्ची नाराजगी मेरी , लेकिन अतीत से आती वो आवाज आज भी मेरा अपमान करती है 

730  दिन की इस कहानी में हम ये सोचने लगे थे  की हम 
एकदूसरे की ज़िन्दगी के विशेषज्ञ बन गए ,
लेकिन सब कुछ धोखा था , 
किसी के खाली  वक्त के मनोरंजन का शिकार था मै ,
सबके सामने वो मुझे बदनाम करती है ,
दरवाजा ठीक से लगाया तो था  उन सभी बुरी घटनाओं पर , कायम नहीं हो सकी कच्ची नाराजगी मेरी , लेकिन अतीत से आती वो आवाज आज भी मेरा अपमान करती है 
   - गौतम पात्र 

8/7/20
1:24 am