एक दिन की छुट्ठी 
ये परिवार कहाँ रहता है 
एक ही घर में सभी सदस्य नहीं मिलते ,
आखरी बार कब देखा था ,
ये शंचय होकर कभी नहीं  दिखते 
एक दिन की छुट्ठी क्यों नहीं लेते  
सुबह शाम काम से फुर्सत नहीं ,
बस खाए पिए सो गए और कोई कहानी नहीं ,
सब ठीक चल रहा है  ना ,
सिर्फ इतना  पूछ लेना क्या लापरवाही नहीं ,
परिवार में वक्त कम हो गया दुसरो का काम देखते देखते 
एक दिन की छुट्ठी क्यों नहीं लेते  
बच्चे अकेले रहते है ,
आप टीवी पे लगे रहते है ,
कौन  क्या कर रहा  है ,
कुछ दखल क्यों नहीं देते है  ,
बड़े बड़े सपने उम्मीद लगा लेते हो ,
उनसे सोच - विचार क्यों नहीं करते है ,
गलत है चिंता मुक्त हो जाना सिर्फ फ़ीस भरते भरते 
एक दिन की छुट्ठी क्यों नहीं लेते  
हम अपने घर के चक्कर काट काट के परेशान है ,
कभी कुछ नया दिखाने भी  ले चलो ,
दुनिया भर का अब मत कहना काम है ,
आखरी बार कहा था मनाली चलेंगे पक्की ज़बान है ,
कब तक नही बोलोगे इस तरह डरते डरते 
एक दिन की छुट्ठी क्यों नहीं लेते
अगर फूलो को सभी तरह के  पोषण ना मिले तो वो खिलते नहीं है  ,
ठीक वैसे ही परिवार भी टुकड़े हो जाते है जो घुलते मिलते नहीं है ,
आपस में तर्क होना सही है , रास्ते अलग अलग चलते नहीं है ,
जो परिवार को परिवार जैसा मानते है वो पीछे हटते नहीं है ,
इसलिए बोलती हु 
एक दिन की छुट्ठी क्यों नहीं लेते
                               - गौतम पात्र 
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17/8/20 3:31 am