फ़सुर्दा
फ़सुर्दा
देह अभी अभी खोकर , फ़सुर्दा बैठा था रूह
बगल से बहते बहते पानी टकराए पत्थरों से तो कुछ छीटों ने
पूछ लिया इतने गंभीर क्यों हो , क्या हुआ
छिठो के सवाल उसके होठ , नाक , आख पर जाकर गिर पड़े ,
पर वो कुछ ना बोला , चुप रहा और उठ गया ,
पाकर कुछ बुँदे उसके आखो की पानी कुछ समझ नहीं पाया और आगे बह गया
मौत से सौ कर जब उठा , फ़सुर्दा बैठा था रूह
बगल में घुमती फिरती हवा तेज हुई पूछने लगी इतना रो क्यों रहे हो ,
तो उनकी भी बिना सुने वो चल पड़ा ,
पर सामने हवा फिर आई और फिर पूछने लगी
रूह ने कहा मेरी ज़िन्दगी अब नहीं रही ,
जब तक मैंने आखे खोली तब तक मै गंगा में विसर्जित हो गया था ,
मै अपने परिवार से कभी नहीं मिल पाऊंगा ,
मै अब दुसरे लोक का प्राणी हो जाऊंगा और उनके मुस्कुराते हुए चहरे लेजाते हुए मुझे बिलकुल अच्छा नहीं लग रहा है ,
हवा ने सात्वना देते हुए कहा तुम्हारे साथ बहुत बुरा हुआ है
पर तुम्हे खुश होना चाहिए तुम अपने असली रूप और होश में आ गए हो और जल्द तुम्हे मोक्ष मिल जाएगा ,
तो रूह ने कहा मेरे कातिल तो सरे आम अयाशी कर रहे है ,
जब तक उन्हें सजा नहीं होगी ,मै कहीं नहीं जाऊंगा
- गौतम पात्र
s- 8/27/20 1:28 AM
F -8/27/20 2:32 AM

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