कागज़
एक सफ़ेद पन्ना ,
खिची रेखा उसमे
खाली फिर भी है ,
बिक जाती है लिखने वाले को
कागज़
भाषा को मंच दे ,
ताकी कोई पढ़ सके ,
कलम से है यारी बड़ी ,
छप जाती है बात उसकी
कागज़
पेड़ो के पेट काट के ,
बदन इसका सफ़ेद है ,
इस्तमाल में है ,
पूंजी है ये विचारों की ,
दब जाती है किसी रखरखाव में
कागज़
©गौतम पात्र
Written on the year 2018 May/June in between

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